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| “दशा माता व्रत के आठवें दिन श्रद्धा और भक्ति से की गई पूजा से घर में सुख, शांति और समृद्धि का वास होता है।” |
कथा के अनुसार एक समय एक राज्य में एक राजा और रानी रहते थे। प्रारंभ में उनके जीवन में अपार सुख-समृद्धि थी, लेकिन समय के साथ-साथ राजा के भाग्य ने पलटा खाया और राज्य में संकट आने लगे। महल की समृद्धि घटने लगी और धीरे-धीरे उनका वैभव समाप्त होने लगा। ऐसे कठिन समय में रानी ने देवी की शरण लेने का निश्चय किया और श्रद्धा से दशा माता का व्रत आरंभ किया।
रानी प्रतिदिन प्रातः स्नान करके घर की दीवार पर हल्दी और कुमकुम से दशा माता का पवित्र चित्र बनाती, उसके पास दस गांठों वाला पवित्र धागा बांधती और दीपक जलाकर पूजा करती। वह पूरे नियमों के साथ कथा सुनती और माता से अपने परिवार की रक्षा की प्रार्थना करती। सात दिनों तक निरंतर पूजा करने के बाद आठवें दिन रानी के धैर्य और भक्ति की परीक्षा का समय आया।
कहते हैं कि आठवें दिन रानी को अनेक प्रकार की बाधाओं का सामना करना पड़ा। कभी घर के कामों की अधिकता, तो कभी अचानक आने वाली परेशानियों ने उसके व्रत को बाधित करने का प्रयास किया। फिर भी रानी ने हार नहीं मानी और दृढ़ विश्वास के साथ पूजा-पाठ जारी रखा। उसकी अटूट श्रद्धा देखकर दशा माता प्रसन्न हुईं और उसे आशीर्वाद दिया कि शीघ्र ही उसके जीवन की सभी विपत्तियां दूर होंगी।
माता के आशीर्वाद का प्रभाव धीरे-धीरे दिखाई देने लगा। राजा के कार्यों में सफलता मिलने लगी, राज्य में सुख-शांति लौटने लगी और घर में समृद्धि का वातावरण बनने लगा। इस प्रकार आठवें दिन की कथा यह संदेश देती है कि कठिन परिस्थितियों में भी यदि मनुष्य धैर्य और श्रद्धा बनाए रखे तो देवी की कृपा से उसकी दशा अवश्य बदलती है।
इसी कारण से आज भी महिलाएं पूरे विश्वास के साथ दशा माता व्रत के आठवें दिन विशेष भक्ति के साथ पूजा करती हैं और माता से अपने परिवार की सुख-समृद्धि तथा संकटों से मुक्ति की कामना करती हैं।
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